Thursday 24 January 2008

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है
पर न जाने क्‍यूं बात नहीं होती है
दिल चाहता है उनके करीब होना
फिर भी वो मुझसे दूर होती हैं

कभी ख्‍वाबों में तो कभी जागते हुए
उनसे मुलाकात होती है
अक्‍सर लगता है वो हैं आसपास
पर दिल से न जाने क्‍यूं दूर होती हैं

कुछ कहते हैं कि वो एक ख्‍वाब है
जिसे केवल देखा जा सकता है
पर मैं कहता हूं वो ख्‍वाब में नहीं
मेरी दिल की धड़कनों में बसती हैं

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है
वो हमसे न जाने क्‍यूं दूर होती हैं

5 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

कविता में तो अपना भी हाथ तंग है, इसलिए ज्‍यादा कुछ बता नहीं सकता।
बस इतना जरूर है कि जो लिखना चाह रहे हो समझ आ रहा है।
शुभकामनाएं

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया है! दर-असल कविता की परिभाषा अलग अलग विद्वान अलग-अलग देते हैं। अपने को कविताई के ठेकेदार कुछ का मानना है कि तुकबंदी ही कविता है तो कुछ का मानना है गद्यात्मक काव्य हो ही नही सकता तो कुछ कहते हैं कि छंद आवश्यक हैं।
खैर इसीलिए अपन अपने लिखे को कविता न कहकर कविता जैसा कुछ कहते हैं। सो अपन हुए कविता जैसा कुछ के प्रवर्तक, आप बन जाईए कविता जैसा कुछ के समर्थक ;)

mehek said...

bahut khub

sil ki dhadkano mein rehna kismat thi unki
unka saath na rehna kismat thi hamari
aajib hota hai kismat ka khel
jahan bhi rahun,yaad aati hai unki.

Mired Mirage said...

सुन्दर !
घुघूती बासूती

Keerti Vaidya said...

SWEET POEM..