Wednesday, 1 October, 2008

मैं आप सभी को छोड़कर जा रही हूं

उन दोनों के तलाक की खबर सुनने में उसे एक अजीब सा सकून मिल रहा था। यह स्वाभाविक भी था शायद। लेकिन कहीं न कहीं कुछ गलत भी था। कल ही उसे पता चला कि उन दोनों का तलाक हो गया है। वह उसकी पूर्व प्रेमिका थी, जो बिछड़ गई थी और उसे उम्मीद है कि तलाक के बाद अब वे फिर से एक दूसरे की बांह में झूल सकते हैं। हां यही तो उसे दिमाग में घूम रहा था। अचानक उसके मोबाइल की रिंग टोन ने उसे जगाया। वह सही था। पूरे आठ साल बाद मोबाइल की स्कीन पर परूनिषा की फोटो नंबर के साथ चमक रही थी। उसे विष्वास नहीं हुआ। लेकिन काॅल उसी का था। कांपते हाथों से उसने मोबाइल की स्वीच दबा और कहा हां बोलो। उधर से उसने जो कहा, वह उसके वजूद को हिलाने के लिए काफी था। परूनिषा ने कहा, बस अब सहन नहीं होता। मैं आप सभी को छोड़कर जा रही हूं। बस और उधर से फोन काट दिया गया। वह आज भी उस शहर में परूनिषा को खोज रहा है जहां वह उसे छोड़कर गया था।

Wednesday, 13 February, 2008

मुझे डूब जाने दो

तुमसे थी मुझे प्रेम की अभिलाषा
तुमसे है मुझे प्रेम की अभिलाषा
ना चाहिए और कुछ
बस पिला दो मुझे प्रेम की दो बूंदें
कभी यहां, कभी वहां भटकते भटकते
थक के हो गया हूं मैं चूर
बस मुझे डूब जाने दो
अपने सागर से भी गहरे नयनों में
जा होगी मेरी प्‍यास तृप्‍त
सूखे होंठों को बच डूब जाने दो
और मुझे दे दो जीवन के कुछ और दो पल

Wednesday, 6 February, 2008

तुम बदल गई हो

तुम कितनी बदल गई हो
अब तुम न तो होंठों को दबा कर मुस्‍कुराती हो
और न मुझे प्‍यार से बुलाती हो

न अब महाराजा महारानी की कहानी है
और अब तो बस चारों और खामोशी है

जिस शहर में तुम हो
वो कभी हमारा था
पर अब तो केवल वो एक शहर है
जहां न अब प्रेम के गीत जाते हैं
और न कोई कहानी दोहराई जाती है
तुम कितनी बदल गई हो

खामोशी

उसके लबों की खामोशी आज भी मुझे डराती है
लब कहना चाहते हैं शायद बहुत कुछ
लेकिन वो बस बुदबुदा कर रह जाती है
डर तो पहले भी लगता था उसकी खामोशी से
पर अब थोड़ा सहम भी जाता हूं मैं उसकी खामोशी से

Thursday, 24 January, 2008

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है
पर न जाने क्‍यूं बात नहीं होती है
दिल चाहता है उनके करीब होना
फिर भी वो मुझसे दूर होती हैं

कभी ख्‍वाबों में तो कभी जागते हुए
उनसे मुलाकात होती है
अक्‍सर लगता है वो हैं आसपास
पर दिल से न जाने क्‍यूं दूर होती हैं

कुछ कहते हैं कि वो एक ख्‍वाब है
जिसे केवल देखा जा सकता है
पर मैं कहता हूं वो ख्‍वाब में नहीं
मेरी दिल की धड़कनों में बसती हैं

अक्‍सर उनसे मुलाकात होती है
वो हमसे न जाने क्‍यूं दूर होती हैं

Friday, 18 January, 2008

कौवे

अब काले कौवे नहीं दिखते हैं शाख पर
संसद में उनकी आवाजाही बढ़ गई है

खादी की टोपी से लेकर नेकर तक
कौवे कांव कांव कर रहे हैं संसद में

किसी के लिए राम जरुरी है
किसी के लिए जरुरी है गरीबों का हाथ
फिर भी कौवे कांव कांव कर रहे हैं

कोई कहता है वे गायब हो रहे हैं
तो कोई कहता है संसद निगल रही है उनको

गली से लेकर संसद के गलियारों तक में
कौवे कांव कांव कर रहे हैं

मुंबई, 18 जनवरी 2008